मंगलवार, 2 अगस्त 2016

उच्छिष्ट


यहाँ हम  

आधे दलित का दुःख


कहानी संग्रह से निम्न कहानी ले रहे हैं (साभार) जिस कहानी का नाम है 

उच्छिष्ट 

जिसके लेखक हैं श्री 
उमराव सिंह जाटव 
जो चित्रकला के विद्यार्थी रहें हैं और अपने अनुभव को उन्होंने इस कहानी के माध्यम से कहा है यद्यपि कहानी के सारे पात्रों का नाम काल्पनिक है !

(मैं उन जातिवादी, महाभ्रष्ट और दुराचारी शिक्षकों को यह कहानी समर्पित करता हूँ जिससे आने वाली पीढियां इससे सबक लेकर अपना जीवन वर्बाद न होने दें)


वैसे तो जाटव साहब सेना के बड़े अधिकारी रहे हैं लेकिन वे 
चित्रकला विभाग के विद्यार्थी भी रहे हैं जिसमें अपने समय के कला विभाग के बारे में जो उनका उल्लेख है उसे पढ़कर ही देखें ;














































रविवार, 18 अक्टूबर 2015

रावण

हज़ार हाथ मेरे होते तो मैं रावण को मार पाता क्या ?
मुझे नहीं लगता कि रावण मरेगा कभी क्योंकि ?
एक रावण मेरे अन्दर भी है ! जो पैदा हो जाता है मेरे अहंकार से 
मुझे नहीं लगता कि हमने कभी भी उससे लड़ने की कोशिश की 
वह मर जाता अगर हम रावण को मारने की वजाय उसका तिरस्कार करते !

क्या कभी इस रावण से मुलाक़ात हुई आपकी शायद हाँ ?
क्योंकि रोज़ आगे आगे वह चल पड़ता है !
शौचालय से, स्नानालय से, पूजाघर से, सज्जाघर और माथे पर चढ़,
पर रावण को मरने की बहुत चिन्ता है जिससे वह सम्भल जाता है !
दर्पण में िदखता तो है पर हम छुपा लेते हैं अपने भीतर उसे प्रतिदिन 

जब यह घर के बाहर आता है तो इसकी मुलाक़ात होती है 
समरथ के सरोकारों से, रिक्शावालों के बलवान होने के दम्भ से
ख़ास लोगों के संग गनर और डर्ाईबर से बाबू और पियुन से
मुलाक़ातियों के मरे हुए हुनर और कर्मचारियों के दम्भ से !
रहकर रहकर रावण दहाड़ता है काल बेल से !

फिर निकलता है रावण दौरे पर हज़ारों रावण सम्भल जाते हैं
दिखते तो सहमें हुए हैं पर अपने अन्दर के रावण को धीरज देते
कहते ही नहीं हैं करते हैं रावण की तरह अहंकार का प्रदर्शन !
फिर मेरा रावण तेरा रावण सब लंच पर चले जाते हैं 
सन्नाटा छा जाता है जैसे रावण आराम करने चला जाता है?

कहीं राम नज़र आता है ! जिसकी सीता को रावण उठा ले गया हो 
और किसी वाटिका में रखने के लिये नहीं आजकल की सीताएँ 
सरकारी,नीजी वाटिकाओं की तलाश करती हैं वेतन पर
पर अब इन्हें डर नहीं लगता रावणों से क्योंकि ये जान गयी हैं
कि यहाँ रावण दहाड़ता नहीं दहाड़ता हुआ दिखता है !

हज़ार हाथ मेरे होते तो मैं रावण को मार पाता क्या ?
मुझे नहीं लगता कि रावण मरेगा कभी क्योंकि ?
एक रावण मेरे अन्दर भी है ! जो पैदा हो जाता है मेरे अहंकार से 
मुझे नहीं लगता कि हमने कभी भी उससे लड़ने की कोशिश की 

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

मेरी फितरत और तमन्ना थी

मेरी फितरत और तमन्ना थी कि हम वो करे जो आज तक नहीं हुआ !
ये कहाँ मंजूर था उनको जो फितरत में रात दिन उल्टा ही करता था !

जिन्हे मैं ये समझाने में ही ग़ाफ़िल था वो उन्हें भरमाने में काबिल था !
उसे हर चीज में ही महारत है इस बात का भी उन्हें एहसास ही तो था !

भला करना उसे आता भी नहीं तो है लुटेरों की बरात में 
मैं कैसे कह दूँ ये की वो भरमाँ दिया होगा मेरा साहस मेरी हिम्मत भी तो है !

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

प्रकृति /प्रवृत्ति

डॉ लाल रत्नाकर 
(1)
प्रकृति 

मैं जब गांव में था तब सुनता था !
एक वो हैं जो प्रकृति के संरक्षण के लिए
वातावरण की खुशहाली के लिए
वृक्ष रोपते थे !
पर दूसरे वे थे जो वृक्ष को उखाड़ते थे
या उखड़वा देते थे !
जब शहर आया तो देखा यहाँ तो
वृक्ष रोपते ही नहीं हैं !
जब यहाँ इसकी सुरुआत की तो
तो सहारा मिला और वृक्ष लगते गए
पर मुझे क्या पता था !
की अब वो भी यहाँ आ गए जो
जो वृक्ष को उखाड़ते थे
या उखड़वा देते थे !
वे ऐसा क्यों करते हैं ?
जब ये सवाल मैंने किया
तो मन ने ही गुस्सा किया
क्यों उनकी सोचते हैं
उनका अपना काम है
आप अपना करिये !
ओ उखाड़ने के लिए हैं
आप रोपने के लिए !


(2)
प्रवृत्ति 

पर डर और तरह का  है
हम तो वट  वृक्ष रोप  रहे थे
वे उनपर रेड रोप रहे है
रेंड से जो तेल निकलता है
कई तरह से काम आता है
औषधि में, मोट में, और
चमरौधे जुते में !
पर अब इस रेंड का क्या
अब तो गावों तक में
प्लास्टिक के माल जा पहुंचे
पर जो  गावों से मरहूम होती
संस्कृति को हम शहर लेकर आये
तो वे लम्बरदार की तरह
भेष बदलकर यहाँ आ ही गए
और पुरानी अबूझ रंजिश
से यहाँ भी कहा
मैं सब कुछ जानता हूँ
कला कौशल कविता कहानी
सब कुछ मेरे हिसाब से ही
गढी जायेगी, पढ़ी जायेगी !
क्योंकि मैं सत्ता में हूँ।



मंगलवार, 22 जुलाई 2014

मैंने देखा है इसे गढ़ते हुए.....

यह महज एक पत्थर का टुकड़ा
आमजन के लिए किसी किनारे
बे वजह टिका देने के सिवा और
कुछ भी तो नहीं था .

पर एक रचनाकार की नजर ने
ढ़ूढ़ लिया इसके भीतर का यह रूप
जो सदियों से छुपा हुआ था परम्परा
के घूंघट में मेहनतकश जातियों के
श्रम करते गांव मे .

सभ्यता दरअसल असभ्यता से इतनी
भयभीत क्यों रहती है ?
मैंने देखा है इसे गढ़ते हुए
कामचोर जातियां समझती हैं ये श्रम
तो निरर्थक है इसका मूल्य तो मुझे
नहीं मिलेगा क्योंकि इसमें जितना
श्रम है उसके एवज में मूल्य बहुत ही
कम है ?

मेरे मित्रों मेरी बेवकूफियां ही सही
ये कृतियां आज ही नहीं हमेशा 
हमें
सन्देश देंगी श्रम और रचनाकर्म
की कि समाज का स्वरूप लूट से ही
नहीं मेहनत से संवरता है।

आईए मेहनत से संवारे मुल्क को
'इमारत’ पटेल की हो या गुजरी की
दोनों गढ़ी गयीं हैं पौरूष से अन्यथा
ये बुत बेजान हो जांएंगे प्रसाद और
अपराध के जल से, फल से.

-डा. लाल रत्नाकर

बुधवार, 27 मार्च 2013

भारतीय कलाएं

भारतीय कलाएं आम आदमी की खुशियाँ थीं, धीरे धीरे आम आदमी की पकड़ से ये दूर होती गयीं और अब खास लोगों की ये कृपा की पात्र होती जा रही हैं . तो क्या लगता है की यही स्थिति बनी रहेगी, जैसा चल रहा है उससे तो यही लगता है की आने वाले दिनों में इसकी दशा और ख़राब होगी।
राज्य और आम लोगों के बीच बढती खाइयाँ इन कलाओं के निर्माण से हटती और कटती जा रही हैं, जब तक इनका संरक्षण नहीं होगा यह समाप्त हो जायेंगी . 
तारक दा की कृति के साथ नेहा अग्रवाल 

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

कला



कला जन्मजात होती है, अभ्यास से इसमें निखार आता है .
-एक कलाकार