बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

कला



कला जन्मजात होती है, अभ्यास से इसमें निखार आता है .
-एक कलाकार 

शनिवार, 15 सितंबर 2012

आज और कल

समीक्षा
कला के क्षेत्र में अनेक प्रकार के प्रयोग हो रहे हैं अनेकों क्षेत्रों के विविध वर्गों के लोग इस विषय  में रूचि ले रहे हैं, कारन क्या है व्यवसायिकता का प्रवेश इसका कारन है या शिक्षा का विकास।


हमारा समाज आज अनेक तरह के लोगों को जिस मुकाम तक बाज़ार ले आया है उसका असर अनेक तरह से हो रहा है -

बुधवार, 29 अगस्त 2012

पेंटर


मैंने ऐसा जानबूझकर किया -

ये तीन कवितायें विचार हेतु प्रस्तुत हैं -
(ये कला के लिए हैं किसी तरह से अन्य भाओं को इनसे 
सम्बद्ध नहीं किया जा सकता यदि कोई करता है तो वह मात्र मूढ़ ही होगा )




एक एहशास को समर्पित -

डॉ0 लाल रत्नाकर 

बुधवार, 25 जुलाई 2012

एक बात और !

डॉ.लाल रत्नाकर 


(संघर्ष और इमानदारी को लेकर लिखी गयी छंदमुक्त कविता उन तमाम लोगों को समर्पित है जो रातदिन भ्रष्टाचार और बेईमानी में मशगूल हैं और इमानदारी का नाटक करते हैं, नाचते हैं गाते हैं चौराहों पर प्रदर्शन करते हैं। लेकिन अपनी नियति नहीं बदलते हैं या यूँ कहिये की वो भूल गए हैं की इम्मान्दारी क्या होती है, ये स्वार्थी तत्व क्या कभी बदलेंगे .)

आईये एक संकल्प लेते हैं
इमानदारी का - संघर्ष का

बुरे को बुरा कहने का मुहं पर
जरा देखिये आपके पीछे की
जगह खाली है कोई नहीं है
क्यों ! कहाँ गए वो लोग जो
बात कर रहे थे इमानदारी की
और डटकर संघर्ष करने का

आईये एक बार फिर ढूढ़ते हैं
शायद कहीं मिल जाएँ जहाँ
कोई बेईमान न हो और ओ
वहां कोई योजना बना रहे हों
संघर्ष तेज़ करने का !

लेकिन ओ तो यहाँ बैठे उन्ही के बीच
ठहाके लगा रहे हैं इमानदारी पे और
बता रहे हैं की काम बहुत है जिम्मेदारी
भी है पर क्या इनका अपहरण हो गया
या ये खरीद लिए गए हैं भारतीय
मतदाताओं की तरह और हिस्सा हो
गए हैं उसी व्यवस्था के जिन्हें मिलने
के बाद छोड़ना नहीं आता कोई पद

नहीं नहीं ऐसा नहीं है अभी इनमे
ज़मीर बाकी है इन्होने ये सब
हथियाया नहीं है इन्हें दिया गया है
जिससे संघर्ष कमजोर पड़ जाए
और 'खाप' की इज्जत बची रह जाए
पर कब तक ऐसे ये इज्जत बचाते
मुहँ चुराते रहेंगे क्योंकि ये खेल
खाप का नहीं 'उनके' बाप का है
जिन्हें पता है की सारी दुनिया
खाप  से नहीं हिसाब से चलती है

इन्होने हिसाब लगाकर देखा है
की ओ संघर्ष की बात क्यों करता है
उसकी आमदनी का श्रोत कुछ और
जरूर है 'या तो वो' प्रापर्टी डीलर है
या कमीशन खोर है !
या कुछ और होगा क्योंकि वह ट्यूशन
तो पढाता नहीं है फिर आमदनी का
जरिया क्या है ?
चलो ऐसा करते हैं की उसको कालेज
का कोई काम नहीं देते है जिसमे
अतिरिक्त आय होती है फिर देखते हैं
कैसे संघर्ष करता है ?

शायद वे भूल गए हैं की 'संघर्ष'
बेईमान बनने के लिए नहीं होता
संघर्ष करने वाला चरित्रहीन नहीं होता
संघर्ष वही करता है, जो चापलूस नहीं होता
और हर तरह से इमानदार होता है
केवल इमानदारी का नाटक नहीं करता .



 

  

किसके लिए दायित्व का निर्वहन

डॉ.लाल रत्नाकर 

आज कालेज और विश्वविद्यालय दिखावे की जगह होकर रह गए हैं. जहाँ शिक्षा के नाम पर कामचोरी और कापी की प्रवृत्ति बढ़ गयी है-
प्राइवेट कालेज केवल व्यवसाय के अड्डे बनकर रह गए हैं .
सरकारी कालेज में आरक्षण से जो आ जा रहे हैं उनके लिए पूरी व्यवस्था उदासीन है . और उन्हें खुद ये ख्याल नहीं है की वह क्या करने आये हैं . उन्हें तो तैयार चाहिए श्रम करना तो उनके लिए पाप  जैसा है . अतः वे शिक्षक जो उन्हें तैयार (नक़ल की हर सामग्री, फोटो स्टेट नोट, घर बुलाकर बहकाने में माहिर हैं काबिल हैं, पर ये सब कब तक चलेगा . मुझे लगता है अब सत्यानाश होने तक ऐसे ही चलेगा.
चलिए ये सोचना भी पाप है की इनका बदलाव हो, इन्हें नाकारा बनाकर  छोड़ देना है तो आराम करिए और ऊपर बताये तरीके अख्तियार करिए.
मैं ऐसे बच्चों को एम्.ए.की कक्षाओं में देख रहा हूँ जो बी.ए .में एक दिन भी क्लास में नहीं आये हैं और तो और उन्हें तो इंटर क्या प्राइमरी के बच्चों जीतनी आर्ट नहीं आती है, उन्हें इतने नंबर दिए जाते है की आप आश्चर्य से पागल हो जाओगे, कैसे उन्हें नंबर मिलते हैं भगवान ही जाने या नंबर देने वाले जानें. इसी बल पर वो कालेज में उच्च क्लासेस में प्रवेश पा जा रहे हैं .
'एकलव्य' का कविलियत के नाते ड्रोन ने अंगूठा मांग लिया था पर आज तो वे बिना मांगे अपना अंगूठा गुरुजनों को समर्पित कर रहे हैं . मुझे याद है मेरे जमाने में छात्रों में प्रतिभागिता रहती थी कि कौन अच्छा कर रहा है, आज तो उस अच्छे के मायने बदल गए हैं.
ओ ऐसे बदले हैं की गुरु जी तो खुद 'कापी मास्टर' हैं हर चीज बिना समझे, बिना चर्चा के परोस दे रहे हैं और शिष्य सहज उसे स्वीकार ले रहा है क्योंकि क्यों करे माथा पच्ची मास्टर ही तो बनना है, नंबर रहेंगे तो सुबिधा से मेरिट बन जायेगी और नौकरी पक्की।
अब एक तपका और है जो वास्तव में कुछ करना चाहता है, विद्यार्थियों में भी और शिक्षकों में भी चूँकि वह जानता है की विना परिश्रम के कुछ हासिल करना आसांन  नहीं है, सो वह गंभीर है पर है कितना मुट्ठी भर. अब उसकी परेशानियाँ भी हैं, स्वाभाविक है चढ़ना जरा मुश्किल होता हैं उतरना और धोखा करना आसान सो इनकी संख्या सहजतया  ज्यादा हो जायेगी, अनुशासित और श्रमशील होना आसान तो है नहीं, अतः दायित्व की कसौटी क्या होगी ? आज यही सवाल है जिसे हर व्यक्ति टाल रहा है.   
विश्वविद्यालयों की गति बाबुओं के हाथ में है जिससे वो जैसा चाह रहे हैं हो रहा है .



शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

क्योंकि इनके आका बैठे हैं


डॉ.लाल रत्नाकर 
उनके मन में क्या पल रहा है 
मुझे क्या पता, पर अपना मन 
तो साफ है इतना तो पता है 
वो रोज़ रोज़ तिकड़मों के फेरे 
डालते रहते हैं .
शायद भोला समझ कर 
क्योंकि कई चीजें वो पाले हैं 
अपने अपराधी मन में 
जिसके जवाब उनकि की भाषा में 
भेष में देना वैसा ही अपराधी होना है 
पर इनकी सजा उन मुल्कों के मुताबिक 
है जहाँ सरे आम ऐसे अपराधियों को 
क़त्ल कर दिया जाता है 
हो सकता है यह व्यवस्था कहने कों 
मानवीय न लगती हो पर दरअसल 
ये बगैर इसके सुधर नहीं सकते 
क्योंकि इनके आका बैठे हैं 
हर उस जगह जहाँ से ये अपराध करते हैं
और वे इनकी रक्षा करते हैं हजारों वर्षों से 
इसीलिए इन्हें फला साहब कहके 
संबोधित  किया जाता है .
असल में ये साहब क्या ?
मानवीयता के पैमाने पर अपराधी अत्याचारी हैं 
जन्मना ये इसके हक़दार बने हुए हैं 
दर असल इन्हें ठीक करना होगा 
बिगड़े हुए गधे की तरह पीट पीट कर 
तब तो इनकी सारी दादागिरी ठीक होगी 
गधे की तरह दरअसल यही भय
उनके मन में पल रहा है  .

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

स्वामी अग्निवेश से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत


संवाद

अन्ना-रामदेव व्यक्तिवादी हैं

स्वामी अग्निवेश से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

छत्तीसगढ़ के शक्ति में पले-बढ़े आर्य समाजी नेता और बंधुआ मुक्ति मोर्चा के संयोजक स्वामी अग्निवेश ने धर्म, समाज और राजनीति के क्षेत्र में जिस तरह से हस्तक्षेप दर्ज किया है, उसमें वे लगातार चर्चा के केंद्र में रहे हैं. हर बार वे चर्चा में आते हैं और फिर चाहें-अनचाहे हाशिये पर चले जाते हैं. यह सिलसिला साठ के दशक से लगातार जारी है. यहां हमने उनसे ऐसे मुद्दों पर बातचीत की है, जो हमारे समकाल को प्रभावित करते हैं.
swami agnivesh


 चैनलों पर इन दिनों एक नये तरह का आध्यात्म और उसके खिलाफ चैनलों का एक हांका भी चल रहा है. निर्मल बाबा एक छोटा सा उदाहरण हैं. आध्यात्मिक व्यक्ति के बतौर इस पूरे दृश्य को आप किस तरह देखते हैं ?
निर्मल बाबा फूहड़ तरीके से अंधविश्वास फैलाकर पैसे बटोर रहा है. उससे चैनल वालों को मुंहमांगा दाम भी मिल रहा हैं. पैसे देकर उन्होंने प्राइम टाइम न्यूज चैनल पर अपना प्रोग्राम कराया. लेकिन न्यूज एक्सप्रेस ने मना कर दिया और उसने स्टिंग ऑपरेशन किया. निर्मल बाबा के दरबार में एक महिला जो ये कह रही थी कि उनके पति का कैंसर बाबा की कृपा से ठीक हो गया है, उससे चैनल ने उनके पति के बारे में पूछताछ की. उसने कहा कि चार साल पहले उनका देहांत हो चुका है. इस स्टोरी से चैनल ने बाबा के खिलाफ समाचार दिखाने की शुरुआत की और अपने चैनल पर इस मुद्दे पर बहस कराई. इसके बाद दूसरे चैनलों ने भी निर्मल बाबा के खिलाफ प्रोग्राम दिखाना शुरु कर दिया.

अब लगातार-लगातार कई चैनल उसके विरोध में हो गए हैं. सभी नहीं हुए हैं, कुछ अभी भी दिखा रहे हैं. मुझे पता चला कि आईबीएन-7 विरोध में नहीं दिखा रहा है. मैं सभी चैनल नहीं देख पाता. मुझे सामान्य तौर पर यह जानकारी मिली. मुझे जानकारी मिली कि न्यूज एक्सप्रेस के संपादक मुकेश कुमार शुरु से ही बाबा का विरोघ कर रहे हैं.

जगह-जगह जो उनके चेले थे, उनमें थोड़ा हड़कंप है. जो पैसा जमा हुआ करता था, वो कम होता जा रहा है. रांची के बैंकों में न के बराबर पैसे जमा हो रहे हैं. सामान बिकना भी बंद हो गया है या कम हो गया हैं. मतलब असर हो रहा है. दो-चार जगह निर्मल बाबा के खिलाफ मुकदमे भी हो गये हैं. लेकिन वो इतना फूहड़, अवैज्ञानिक और गलत सलाह देता है, ईलाज भी बता देता है और लोगों की समस्याओं का समाधान भी कर देता हैं. ये उसकी कहानी है.

 लोकतांत्रिक ढांचे में ऐसे लोगों को क्या कुछ ज्यादा जगह नहीं मिल रही है?
बहुत ज्यादा जगह मिल रही है और ऐसा अंधविश्वास...यही नहीं, ऐसे दूसरे लोग भी ऐसा कर रहे हैं. संविधान की धारा 51-1 कहता है कि देश के हर नागरिक को वैज्ञानिक चेतना को बढ़ावा देना चाहिये. तो इस तरह से देखे और कानून के ढंग से भी देखे तो ये नौसिखिये जिस तरह से ईलाज करते हैं और जिससे बीमारी बढ़ जाती है, यह उस कानून के दायरे में भी आता है. किसी उपभोक्ता को गलत तरीके से सामान बेचने का जो कानून है, यह उसका भी उल्लंघन है. इस तरह से देखें तो यह संवैधानिक तौर पर, कानूनी तौर पर, सामाजिक तौर पर और आध्यात्मिक तौर पर ये गलत है. हमारे तथाकथित लोकतंत्र में इस तरह की चीजों के लिए खुली छूट मिली हुई है. और यह छूट बहुत ज्यादा है.

 जब आप इसे ‘तथाकथित लोकतंत्र’ कहते हैं, तो आपको लोकतंत्र का भविष्य संसदीय राजनीति में नजर आता है या बंदूक की नली का जो रास्ता है, वह बेहतर लोकतंत्र लायेगा ? या फिर क्या कोई और रास्ता आपको नजर आता है ?
नहीं, बंदूक की नली वाला तो कभी ला ही नहीं सकता. उसमें तो लोकतंत्र नहीं होगा. वह तो बंदूकतंत्र ही होगा. अभी तो कम से कम मुझे नहीं लग रहा है कि हमारे देश में बंदूक का तंत्र सफल भी होगा. उसे तो एक हद तक रास्ता बदलना ही होगा. जैसा बहुत हद तक नेपाल में लोगों ने बदला है. हमारे देश में भी माओवाद को अलग रास्ता चुनना पड़ेगा तो शायद कामयाबी हासिल. लेकिन फिलहाल अभी उनकी एक निश्चित भूमिका है. आदिवासियों के जल, जमीन, जंगल को लूटा जा रहा है. उनको कहीं न कहीं थोड़ी-सी राहत मिल रही है. लेकिन लोकतंत्र की संभावनाओं में मुझे उनकी भूमिका ज्यादा दिखती नहीं है. मुझे लगता है कि हमारे इस संसदीय लोकतंत्र में ही थोड़ी कसावट आनी चाहिए. अगर हम संविधान को आधार मानते हैं और उसे सर्वोच्च स्थान देते हैं तो संविधान को सख्ती से लागू करवाना बेहद जरुरी है. यह बात राजनेताओं को भी समझने की जरुरत है और कानूनदा लोगों को भी.


 अभी लोकतंत्र के जिस रास्ते पर हम हैं, क्या उसे कॉरपारेट का लोकतंत्र कहना ठीक होगा या ऐसा कहा जा सकता है कि हम कॉरपारेट लोकतंत्र के रास्ते पर हैं ? 
बाजारवाद हमारे लोकतंत्र और संविधान पर हावी है. हमारी तमाम आर्थिक नीतियों पर भी उसी का कब्जा है. संविधान में जिसे हम समाजवाद कहते हैं, उस समाजवाद को दरकिनार करके नग्न बाजारवाद हावी है.

  ऐसी स्थिति में विकल्प की राजनीति की, कहीं कोई गुंजाइश है. और अगर ऐसा है तो फिर उसकी अगुवाई कौन करेगा ?
हां, अगुवाई तो एक बड़ा सवाल है. वैकल्पिक राजनीति की तो जबरदस्त गुंजाइश है. सारी पार्टियों का एक जैसा हाल है. भाजपा और कांग्रेस तो एक जैसी ही अर्थनीतियां और बाजारवाद के समर्थन में खड़े हैं. उनमें कोई ज्यादा अंतर नहीं दिख रहा है. दूसरी, वामपंर्थी पार्टियों में भी पहले जो संभावना थी, वो सिंगूर और नंदीग्राम जैसी घटनाओं के बाद कम हो गई है. उनका भी ज्यादा भरोसा नहीं है. ऐसे में जनता की आकांक्षाओं के अनुरुप एक जनआंदोलन खड़ा हो, जो एक नई पार्टी का भी रुप ले, उसकी बड़ी जरुरत है. उसका मूल आधार भारत का संविधान होना चाहिए. मैं समझता हूं कि भारत का संविधान एक अच्छा लोकतंत्र और एक अच्छी अर्थव्यवस्था देने में सक्षम हैं. यह हमारी प्राथमिकताएं तय करने के लिए भी पर्याप्त है.

 देश में नौजवानों का जो बड़ा तबका है, वह पूरी संसदीय प्रक्रिया को और राजनीति को ‘डर्टी पिक्चर’ की तरह देखता है. आप गौर करेंगे कि जेपी के बाद एक रोल मॉडल अन्ना हजार के रुप में सामने आया था. लेकिन अन्ना तो पानी का बुलबुला निकले. ऐसे में नौजवानों के भीतर राजनीति को लेकर जो घृणा का भाव है, उसका दोष आप किसे देंगे ?
यही तो गलती हुई है. जेपी के समय भी हमने गलतियां की थी. जेपी ने यहां तक तो किया कि उस आंदोलन की प्रक्रिया से एक वैकल्पिक पार्टी बनाकर दे दी लेकिन जेपी की मजबूरी थी कि उनके स्वास्थ्य ने उनका साथ नहीं दिया और उनकी स्थिति गांधी जैसी हुई. गांधी गोली लगकर चले गये और जेपी बीमार होकर. दोनों के अंतिम समय में, एक गहरी निराशा और हताशा उनके साथ थी. 

हमारे देश को एक ऐसी राजनीतिक पार्टी की जरुरत है, जो आर्थिक लोकतंत्र और राजनीतिक लोकतंत्र दोनों के लिए प्रतिबद्ध हो. वर्तमान में जो पार्टिया हैं, उनमें ऐसी कोई स्थिति नजर नहीं आ रही है, सांगोपांग. लेकिन अपेक्षाकृत छोटी-मोटी कमियों के साथ क्षे़त्रीय दल हैं, जिनमें कहीं-कहीं उम्मीद नजर आती है. 2014 में जो चुनाव आने वाला है, उसके लिए एक वैकल्पिक पार्टी खड़ी करने की जरुरत है. 

यह स्थिति भी बहुत आदर्श नहीं होगी लेकिन मूल बातों के साथ अगर उसका गठन हो तो उसका विस्तार किया जा सकता है. सामाजिक न्याय के लिए जो प्रतिबद्ध पार्टियां है-समाजवादी पार्टी भी और बहुजन समाज पार्टी भी और देश के अंदर कई छोटी-छोटी पार्टियां हैं, सबको इकट्ठा करके कोई लड़ाई लड़ी जाए. साथ ही साथ जनता की शक्ति को और मजबूत किया जाए.

 अन्ना हजारे का जो आंदोलन है, आपकी समझ से क्या वो ऐसी कोई भूमिका निभाता हुआ नजर आता है?
नहीं, उसमें मुझे कहीं कोई संभावना नजर नहीं आती, क्योंकि मैं तो उसके अंदर रहा हूं पूरी तरह से. मैं तो उसी समय दिल से इसे नकार चुका था. बाहर से मैं उसमें पड़ा हुआ था. 25 अगस्त 2011 को रामलीला मैदान से मैं बकायदा उनसे अलग हो गया. 

 आपने टीम अन्ना को छोड़ा या टीम अन्ना ने आपको छोड़ दिया ?
मैंने छोड़ा टीम अन्ना को. रामलीला मैदान में जिस तरह की गतिविधियां चल रही थीं, उसी समय मैंने फैसला किया कि मैं टीम अन्ना को छोड़ दूंगा. पहले भी मेरा मन इसमें विक्षुब्ध था. बहुत ही ग्लानि-सी हो रही थी कि कैसे चल रहा है ये सब कुछ. लेकिन बाहर जन उभार और लोकशक्ति देख कर, लालच कह लीजिये या एक तरह की संभावना देखकर कि शायद एक नये तरह की राजनीति की संभावना है इसमें, इसलिए मैं पड़ा रहा.

 बाबा रामदेव, अन्ना हजारे और श्रीश्री रविशंकर आने वाले दिनों में काला धन वगैरह के मुद्दे पर इकट्ठे हो रहे हैं.
श्रीश्री रविशंकर जी से मेरी बात हुई है और वो इकट्ठे नहीं हो रहे हैं. वो इसमें शामिल नहीं है,ऐसा उन्होंने मुझे कहा है. और बाकी रामदेव जी और अन्ना हजारे, दोनों अपना गणित देख रहे हैं कि किसके आने से किसको फायदा होगा. चूंकि अन्ना को थोड़ा धक्का लगा और धक्का रामदेव जी को भी लगा लेकिन दोनों के दोनों सोच रहे हैं कि इकट्ठे होकर शायद वे अपनी आवाज और मजबूती के साथ उठा सकेंगे. मुझे ज्यादा कुछ संभावना नहीं लग रही है क्योंकि दोनों व्यक्तिवाद के शिकार हैं.
  ये जो काला धन का मुद्दा है, उसकी तुलना में प्राकृतिक संसाधनों की लूट जिस तरह से राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, गोवा और देश भर में चल रही है, क्या यह ज्यादा बड़ा मुद्दा नहीं है?
स्वामी अग्निवेश


बहुत बड़ा मुद्दा है. प्राकृतिक संसाधनों का निजीकरण जो भूमंडलीकरण का अनिवार्य हिस्सा है,वह वैश्विक स्तर पर भी सबसे बड़ा खतरा है. प्राकृतिक संसाधनों का निजीकरण पूंजीवाद का एक विभत्स चेहरा हमारे सामने लाता है. जब हम समाजवाद कहते हैं तो उसका आशय होता है कि उत्पादन के जो संसाधन हैं, उस पर समाज का नियंत्रण हो. साम्यवाद जब हम कहते हैं तो उसमें राज्य का नियंत्रण आ जाता है. सीपीएम कहती है कि वह राज्य के नियंत्रण वाला मामला छोड़कर समाज के नियंत्रण की ओर आयेगी. लेकिन पूरी दुनिया में जल, जंगल, जमीन और खनिज पर निजी कंपनियों के आधिपत्य का दौर चल रहा है. प्राकृतिक संसाधनों पर चंद कॉरपोरेट घरानों का कब्जा हो रहा है. इस विभत्स चेहरे के बाद तथाकथित रुप से चुनी हुई सरकारों की भूमिका दलाल की तरह ही रह जाती है और जनता गुलामी की तरफ बढ़ती है.

  इन सब मुद्दों को लेकर आपकी कोई भविष्य की कोई लड़ाई या संघर्ष की कोई योजना है क्या ?
देखिये, मेरी तो इच्छा है कि देश में एक सशक्त वैकल्पिक राजनीति हो और चुनाव को एक बेहतर प्रक्रिया तक ले जाया जाये कि एक व्यक्ति एक वोट का निर्धारण हो सके. लोकतंत्र में गरीब, दलित, आदिवासी और बहुसंख्यक समाज के पास लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक बेहतर विकल्प है. हालांकि इसकी ढेरों कमियां हैं लेकिन इसको निरंतर सुधारने की जरुरत है और इसमें भाग लेने की भी. इसमें लोकशक्ति भी है और राजसत्ता का समीकरण भी है. वोट की ताकत के बल पर बदलाव की तरफ ले जाने का एक माद्दा भी है. मैं इसके लिए खुद भी एक अच्छी पार्टी ढूंढ़ रहा हूं और उसको बनाने की कोई प्रक्रिया हो तो मैं भी उसमें शामिल होना चाहता हूं.

 संघ परिवार जिस तरह से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के बतौर प्रोजेक्ट कर रहा है, क्या यह आडवाणी जी का एक और कट्टर चेहरा उतारने की कोशिश है.
निश्चित रुप से आडवाणी जी से भी कुरुप और बदनाम चेहरा है नरेंद्र मोदी जी का. मुझे तो लगता है कि मोदी को उतारने का निर्णय भारतीय जनता पार्टी के लिए बहुत ही हानिकारक होगा. संघ उन्हें जरुर पेश कर रहा है लेकिन भारतीय जनता पार्टी में भी इस मुद्दे को लेकर आपसी टकराहट है. नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी में बातचीत भी नहीं है. उधर सुषमा स्वराज भी खुद पीएम बनना चाहती हैं और मैं समझता हूं कि वे इन तीनों-चारों में बेहतर होंगी. हालांकि मुझे नहीं लग रहा है कि नरेंद्र मोदी को सामने लाकर भाजपा अपना भविष्य संवार पाएगी, उल्टा नुकसान होगा.

अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने में जब वाजपेयी जी ने राजधर्म का पालन करने का उपदेश दिया था, उस समय भाजपा के पास एक बेहतर अवसर था कि वह सांप्रदायिकता और दंगों की राजनीति से अपने को अलग कर लें और ऐसा करके वह अपने को बेहतर स्थिति में ला सकती थी. लेकिन उन्होंने वह मौका खो दिया.

 आप लगातार वन मेन आर्मी की तरह काम करते रहे हैं, आपने कोई संगठन खड़ा क्यों नहीं किया ?
वनमेन आर्मी तो नहीं था मैं. जब मैंने 1968 में शुरुआत की और कलकत्ता छोड़कर हरियाणा में काम करने आया स्वामी इंद्रवेश जी के साथ, उस समय हम लोगों ने आंदोलन वगैरह शुरु किये. कुरुक्षेत्र में युवक क्रांति अभियान के तहत पैदल चले,लाल किले के सामने जलती मशालें लेकर संकल्प लिया कि आगे राष्ट्र बनायेंगे, पूंजीवाद मिटाएंगे. फिर हम लोगों ने आर्य सभा के नाम से उसी दिन पार्टी बनाई, जब हमने संन्यास की दीक्षा ली 7 अप्रैल 1970 को. हमने उसमें वैदिक समाजवाद की विचारधारा ली. उसमें आध्यात्म और समाजवाद का मिश्रण था. उसको लेकर हम आगे बढ़ रहे थे और हमें अच्छी सफलता मिल रही थी, उसी समय जेपी आंदोलन में हमें निमंत्रण मिला.

जयप्रकाश नारायण से प्रभावित होकर हम सब उस आंदोलन में गये. आंदोलन के बाद इमरजेंसी और फिर जनता पार्टी का उदय हुआ. जेपी ने कहा कि अपनी आर्य सभा का जनता पार्टी में विलय करो, विलय किया तो उसमें काफी कुछ भटकाव हो गया. विलय होने के बाद पार्टी में अपने आप ही भटकाव आया और पार्टी दो, तीन, चार साल में टूटने लग गई, बिखरने लग गई. हमारे अपने साथियों में भी भटकाव आ गया.
 
कुछ संवाद और...

उसके बाद मैं सामाजिक कामों में जुट गया. वैसे जनता पार्टी में 1983 तक मैं औपचारिक रुप से चंद्रशेखर जी के साथ बना रहा. लेकिन मैं चंद्रशेखर जी के रव्वैये से भी बहुत खुश नहीं था. उसके बाद जब मैंने उनके खिलाफ अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा तो उन्होंने मुझे पार्टी से निकाल दिया. इसके बाद मैं फिर से सामाजिक कार्यों में जुट गया. गरीबों से जुड़े मुद्दे, बाल मजदूर और बंधुआ मजदूर को केंद्र में रखकर मैंने अपनी लड़ाई शुरु की और व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न खड़ा किया कि इस देश में सामाजिक,राजनीतिक,आर्थिक सारी व्यवस्था क्यों सड़ी पड़ी हुई है, क्यों आजादी के बाद भी करोड़ों लोग इस देश में गुलामी के दौर से गुजर रहे हैं. विकास की प्रक्रिया ही लोगों को और गुलाम बना रही है. ऐसे विकास की अवधारणा पर ही सवाल खड़े करना और साथ ही साथ सामाजिक धार्मिक रिवाजों को भी चिन्हित करना कि ये कहां पर ये गलत है. जैसे-जातिवाद है, सांप्रदायिकता है, महिलाओं के प्रति हमारा जो दृष्टिकोण है. पूरा समाज अंदर से कैसे जर्जर है और हम चाह रहे हैं कि एक खुशहाल, सुंदर राष्ट्र बने और वो नहीं बन पा रहा है. तो ये आंदोलन राजनीतिक भी था लेकिन लोगों को जो नजर आता था और जिस पर चर्चा होती थी, वह सामाजिक दिखता था. उसी में मैंने अपनी पूरी शक्ति, पूरी उर्जा लगाई.

  जनता पार्टी से लेकर नक्सलियों से बातचीत और अन्ना के आंदोलन तक आपके सारे मिशन फेल हो गये. अब तो हाल ये हो गया कि बंगाल और ओड़िशा में नक्सलियों से बातचीत के लिए सरकार ने भी आपको याद नहीं किया. और नक्सलियों ने भी नहीं.
बिल्कुल नहीं किया उन्होंने. फिर भी अपनी जो भूमिका हो सकती थी, मैं निभाता रहा. माओवादियों से अपील करता रहा और सरकार को भी. लेकिन मेरी भूमिका पिछले साल के फरवरी-मार्च तक थी. 26 मार्च को मुझ पर दंतेवाड़ा के दोरनापाल में प्राणघातक-सा हमला हुआ. मैं पुलिस की सुरक्षा में जा रहा था और मुझ पर सलवा जुडूम के लोगों ने हमला किया. इसके बाद मैंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई जिस पर सीबीआई की जांच हो रही है. अभी तक सही ढंग से जांच शुरु भी नहीं हो पाई है.

सीबीआई के लोग इस साल आठ फरवरी को उस इलाके में गये थे तो उन पर भी सलवा जुडूम के लोगों ने ऐसा हमला किया कि वो जान बचाकर भागे. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया है कि वहां तो हमारी ही जान को खतरा है, हम जांच क्या करेंगे.

इसी तरह से आजाद की मौत की भी जो जांच रिपोर्ट आई है, वह भी सुप्रीम कोर्ट में है और 27 अप्रैल को उसकी तारीख है. हम मान कर चल रहे हैं कि सीबीआई की जो जांच है, वह गलत है और उनकी जो हत्या हुई या मुठभेड़, वह फर्जी था.

 नक्सलियों से बातचीत हो या अन्ना का आंदोलन, इस पूरे दृश्य में आपकी विश्वसनीयता संदिग्ध नहीं हुई है?
हर चीज में हम स्वयं निर्णायक नहीं हो सकते. क्या हुई थी और क्या नहीं हुई है, यह सब कुछ दूसरों पर और कुछ इतिहास पर छोड़ना पड़ता है. मैं अपना काम पूरी ईमानदारी से कर रहा हूं. इतना ही मैं कर सकता हूं. जहां तक मेरी प्रतिबद्धता है, सत्य के लिए, मूल्यों के लिए और एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए, उसके लिए मैं काम करता रहूंगा. और घटनाएं उपर-नीचे होती रहेंगी. और वह मेरे हाथ में नहीं है.

 इतिहास में आप अपने को किस तरह से याद किया जाना पसंद करेंगे?
सत्य,प्रेम,करुणा और न्याय के आध्यात्मिक मूल्यों को लेकर समाज परिवर्तन के लिए संघर्ष करने का एक विनम्र प्रयास करने वाला.
(रविवार से ; साभार)