बुधवार, 25 जुलाई 2012

किसके लिए दायित्व का निर्वहन

डॉ.लाल रत्नाकर 

आज कालेज और विश्वविद्यालय दिखावे की जगह होकर रह गए हैं. जहाँ शिक्षा के नाम पर कामचोरी और कापी की प्रवृत्ति बढ़ गयी है-
प्राइवेट कालेज केवल व्यवसाय के अड्डे बनकर रह गए हैं .
सरकारी कालेज में आरक्षण से जो आ जा रहे हैं उनके लिए पूरी व्यवस्था उदासीन है . और उन्हें खुद ये ख्याल नहीं है की वह क्या करने आये हैं . उन्हें तो तैयार चाहिए श्रम करना तो उनके लिए पाप  जैसा है . अतः वे शिक्षक जो उन्हें तैयार (नक़ल की हर सामग्री, फोटो स्टेट नोट, घर बुलाकर बहकाने में माहिर हैं काबिल हैं, पर ये सब कब तक चलेगा . मुझे लगता है अब सत्यानाश होने तक ऐसे ही चलेगा.
चलिए ये सोचना भी पाप है की इनका बदलाव हो, इन्हें नाकारा बनाकर  छोड़ देना है तो आराम करिए और ऊपर बताये तरीके अख्तियार करिए.
मैं ऐसे बच्चों को एम्.ए.की कक्षाओं में देख रहा हूँ जो बी.ए .में एक दिन भी क्लास में नहीं आये हैं और तो और उन्हें तो इंटर क्या प्राइमरी के बच्चों जीतनी आर्ट नहीं आती है, उन्हें इतने नंबर दिए जाते है की आप आश्चर्य से पागल हो जाओगे, कैसे उन्हें नंबर मिलते हैं भगवान ही जाने या नंबर देने वाले जानें. इसी बल पर वो कालेज में उच्च क्लासेस में प्रवेश पा जा रहे हैं .
'एकलव्य' का कविलियत के नाते ड्रोन ने अंगूठा मांग लिया था पर आज तो वे बिना मांगे अपना अंगूठा गुरुजनों को समर्पित कर रहे हैं . मुझे याद है मेरे जमाने में छात्रों में प्रतिभागिता रहती थी कि कौन अच्छा कर रहा है, आज तो उस अच्छे के मायने बदल गए हैं.
ओ ऐसे बदले हैं की गुरु जी तो खुद 'कापी मास्टर' हैं हर चीज बिना समझे, बिना चर्चा के परोस दे रहे हैं और शिष्य सहज उसे स्वीकार ले रहा है क्योंकि क्यों करे माथा पच्ची मास्टर ही तो बनना है, नंबर रहेंगे तो सुबिधा से मेरिट बन जायेगी और नौकरी पक्की।
अब एक तपका और है जो वास्तव में कुछ करना चाहता है, विद्यार्थियों में भी और शिक्षकों में भी चूँकि वह जानता है की विना परिश्रम के कुछ हासिल करना आसांन  नहीं है, सो वह गंभीर है पर है कितना मुट्ठी भर. अब उसकी परेशानियाँ भी हैं, स्वाभाविक है चढ़ना जरा मुश्किल होता हैं उतरना और धोखा करना आसान सो इनकी संख्या सहजतया  ज्यादा हो जायेगी, अनुशासित और श्रमशील होना आसान तो है नहीं, अतः दायित्व की कसौटी क्या होगी ? आज यही सवाल है जिसे हर व्यक्ति टाल रहा है.   
विश्वविद्यालयों की गति बाबुओं के हाथ में है जिससे वो जैसा चाह रहे हैं हो रहा है .



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