डॉ.लाल रत्नाकर
(संघर्ष और इमानदारी को लेकर लिखी गयी छंदमुक्त कविता उन तमाम लोगों को समर्पित है जो रातदिन भ्रष्टाचार और बेईमानी में मशगूल हैं और इमानदारी का नाटक करते हैं, नाचते हैं गाते हैं चौराहों पर प्रदर्शन करते हैं। लेकिन अपनी नियति नहीं बदलते हैं या यूँ कहिये की वो भूल गए हैं की इम्मान्दारी क्या होती है, ये स्वार्थी तत्व क्या कभी बदलेंगे .)
आईये एक संकल्प लेते हैं
इमानदारी का - संघर्ष का
बुरे को बुरा कहने का मुहं पर
जरा देखिये आपके पीछे की
जगह खाली है कोई नहीं है
क्यों ! कहाँ गए वो लोग जो
बात कर रहे थे इमानदारी की
और डटकर संघर्ष करने का
आईये एक बार फिर ढूढ़ते हैं
शायद कहीं मिल जाएँ जहाँ
कोई बेईमान न हो और ओ
वहां कोई योजना बना रहे हों
संघर्ष तेज़ करने का !
लेकिन ओ तो यहाँ बैठे उन्ही के बीच
ठहाके लगा रहे हैं इमानदारी पे और
बता रहे हैं की काम बहुत है जिम्मेदारी
भी है पर क्या इनका अपहरण हो गया
या ये खरीद लिए गए हैं भारतीय
मतदाताओं की तरह और हिस्सा हो
गए हैं उसी व्यवस्था के जिन्हें मिलने
के बाद छोड़ना नहीं आता कोई पद
नहीं नहीं ऐसा नहीं है अभी इनमे
ज़मीर बाकी है इन्होने ये सब
हथियाया नहीं है इन्हें दिया गया है
जिससे संघर्ष कमजोर पड़ जाए
और 'खाप' की इज्जत बची रह जाए
पर कब तक ऐसे ये इज्जत बचाते
मुहँ चुराते रहेंगे क्योंकि ये खेल
खाप का नहीं 'उनके' बाप का है
जिन्हें पता है की सारी दुनिया
खाप से नहीं हिसाब से चलती है
इन्होने हिसाब लगाकर देखा है
की ओ संघर्ष की बात क्यों करता है
उसकी आमदनी का श्रोत कुछ और
जरूर है 'या तो वो' प्रापर्टी डीलर है
या कमीशन खोर है !
या कुछ और होगा क्योंकि वह ट्यूशन
तो पढाता नहीं है फिर आमदनी का
जरिया क्या है ?
चलो ऐसा करते हैं की उसको कालेज
का कोई काम नहीं देते है जिसमे
अतिरिक्त आय होती है फिर देखते हैं
कैसे संघर्ष करता है ?
शायद वे भूल गए हैं की 'संघर्ष'
बेईमान बनने के लिए नहीं होता
संघर्ष करने वाला चरित्रहीन नहीं होता
संघर्ष वही करता है, जो चापलूस नहीं होता
और हर तरह से इमानदार होता है
केवल इमानदारी का नाटक नहीं करता .
(संघर्ष और इमानदारी को लेकर लिखी गयी छंदमुक्त कविता उन तमाम लोगों को समर्पित है जो रातदिन भ्रष्टाचार और बेईमानी में मशगूल हैं और इमानदारी का नाटक करते हैं, नाचते हैं गाते हैं चौराहों पर प्रदर्शन करते हैं। लेकिन अपनी नियति नहीं बदलते हैं या यूँ कहिये की वो भूल गए हैं की इम्मान्दारी क्या होती है, ये स्वार्थी तत्व क्या कभी बदलेंगे .)
आईये एक संकल्प लेते हैं
इमानदारी का - संघर्ष काबुरे को बुरा कहने का मुहं पर
जरा देखिये आपके पीछे की
जगह खाली है कोई नहीं है
क्यों ! कहाँ गए वो लोग जो
बात कर रहे थे इमानदारी की
और डटकर संघर्ष करने का
आईये एक बार फिर ढूढ़ते हैं
शायद कहीं मिल जाएँ जहाँ
कोई बेईमान न हो और ओ
वहां कोई योजना बना रहे हों
संघर्ष तेज़ करने का !
लेकिन ओ तो यहाँ बैठे उन्ही के बीच
ठहाके लगा रहे हैं इमानदारी पे और
बता रहे हैं की काम बहुत है जिम्मेदारी
भी है पर क्या इनका अपहरण हो गया
या ये खरीद लिए गए हैं भारतीय
मतदाताओं की तरह और हिस्सा हो
गए हैं उसी व्यवस्था के जिन्हें मिलने
के बाद छोड़ना नहीं आता कोई पद
नहीं नहीं ऐसा नहीं है अभी इनमे
ज़मीर बाकी है इन्होने ये सब
हथियाया नहीं है इन्हें दिया गया है
जिससे संघर्ष कमजोर पड़ जाए
और 'खाप' की इज्जत बची रह जाए
पर कब तक ऐसे ये इज्जत बचाते
मुहँ चुराते रहेंगे क्योंकि ये खेल
खाप का नहीं 'उनके' बाप का है
जिन्हें पता है की सारी दुनिया
खाप से नहीं हिसाब से चलती है
इन्होने हिसाब लगाकर देखा है
की ओ संघर्ष की बात क्यों करता है
उसकी आमदनी का श्रोत कुछ और
जरूर है 'या तो वो' प्रापर्टी डीलर है
या कमीशन खोर है !
या कुछ और होगा क्योंकि वह ट्यूशन
तो पढाता नहीं है फिर आमदनी का
जरिया क्या है ?
चलो ऐसा करते हैं की उसको कालेज
का कोई काम नहीं देते है जिसमे
अतिरिक्त आय होती है फिर देखते हैं
कैसे संघर्ष करता है ?
शायद वे भूल गए हैं की 'संघर्ष'
बेईमान बनने के लिए नहीं होता
संघर्ष करने वाला चरित्रहीन नहीं होता
संघर्ष वही करता है, जो चापलूस नहीं होता
और हर तरह से इमानदार होता है
केवल इमानदारी का नाटक नहीं करता .


