बुधवार, 25 जुलाई 2012

एक बात और !

डॉ.लाल रत्नाकर 


(संघर्ष और इमानदारी को लेकर लिखी गयी छंदमुक्त कविता उन तमाम लोगों को समर्पित है जो रातदिन भ्रष्टाचार और बेईमानी में मशगूल हैं और इमानदारी का नाटक करते हैं, नाचते हैं गाते हैं चौराहों पर प्रदर्शन करते हैं। लेकिन अपनी नियति नहीं बदलते हैं या यूँ कहिये की वो भूल गए हैं की इम्मान्दारी क्या होती है, ये स्वार्थी तत्व क्या कभी बदलेंगे .)

आईये एक संकल्प लेते हैं
इमानदारी का - संघर्ष का

बुरे को बुरा कहने का मुहं पर
जरा देखिये आपके पीछे की
जगह खाली है कोई नहीं है
क्यों ! कहाँ गए वो लोग जो
बात कर रहे थे इमानदारी की
और डटकर संघर्ष करने का

आईये एक बार फिर ढूढ़ते हैं
शायद कहीं मिल जाएँ जहाँ
कोई बेईमान न हो और ओ
वहां कोई योजना बना रहे हों
संघर्ष तेज़ करने का !

लेकिन ओ तो यहाँ बैठे उन्ही के बीच
ठहाके लगा रहे हैं इमानदारी पे और
बता रहे हैं की काम बहुत है जिम्मेदारी
भी है पर क्या इनका अपहरण हो गया
या ये खरीद लिए गए हैं भारतीय
मतदाताओं की तरह और हिस्सा हो
गए हैं उसी व्यवस्था के जिन्हें मिलने
के बाद छोड़ना नहीं आता कोई पद

नहीं नहीं ऐसा नहीं है अभी इनमे
ज़मीर बाकी है इन्होने ये सब
हथियाया नहीं है इन्हें दिया गया है
जिससे संघर्ष कमजोर पड़ जाए
और 'खाप' की इज्जत बची रह जाए
पर कब तक ऐसे ये इज्जत बचाते
मुहँ चुराते रहेंगे क्योंकि ये खेल
खाप का नहीं 'उनके' बाप का है
जिन्हें पता है की सारी दुनिया
खाप  से नहीं हिसाब से चलती है

इन्होने हिसाब लगाकर देखा है
की ओ संघर्ष की बात क्यों करता है
उसकी आमदनी का श्रोत कुछ और
जरूर है 'या तो वो' प्रापर्टी डीलर है
या कमीशन खोर है !
या कुछ और होगा क्योंकि वह ट्यूशन
तो पढाता नहीं है फिर आमदनी का
जरिया क्या है ?
चलो ऐसा करते हैं की उसको कालेज
का कोई काम नहीं देते है जिसमे
अतिरिक्त आय होती है फिर देखते हैं
कैसे संघर्ष करता है ?

शायद वे भूल गए हैं की 'संघर्ष'
बेईमान बनने के लिए नहीं होता
संघर्ष करने वाला चरित्रहीन नहीं होता
संघर्ष वही करता है, जो चापलूस नहीं होता
और हर तरह से इमानदार होता है
केवल इमानदारी का नाटक नहीं करता .



 

  

किसके लिए दायित्व का निर्वहन

डॉ.लाल रत्नाकर 

आज कालेज और विश्वविद्यालय दिखावे की जगह होकर रह गए हैं. जहाँ शिक्षा के नाम पर कामचोरी और कापी की प्रवृत्ति बढ़ गयी है-
प्राइवेट कालेज केवल व्यवसाय के अड्डे बनकर रह गए हैं .
सरकारी कालेज में आरक्षण से जो आ जा रहे हैं उनके लिए पूरी व्यवस्था उदासीन है . और उन्हें खुद ये ख्याल नहीं है की वह क्या करने आये हैं . उन्हें तो तैयार चाहिए श्रम करना तो उनके लिए पाप  जैसा है . अतः वे शिक्षक जो उन्हें तैयार (नक़ल की हर सामग्री, फोटो स्टेट नोट, घर बुलाकर बहकाने में माहिर हैं काबिल हैं, पर ये सब कब तक चलेगा . मुझे लगता है अब सत्यानाश होने तक ऐसे ही चलेगा.
चलिए ये सोचना भी पाप है की इनका बदलाव हो, इन्हें नाकारा बनाकर  छोड़ देना है तो आराम करिए और ऊपर बताये तरीके अख्तियार करिए.
मैं ऐसे बच्चों को एम्.ए.की कक्षाओं में देख रहा हूँ जो बी.ए .में एक दिन भी क्लास में नहीं आये हैं और तो और उन्हें तो इंटर क्या प्राइमरी के बच्चों जीतनी आर्ट नहीं आती है, उन्हें इतने नंबर दिए जाते है की आप आश्चर्य से पागल हो जाओगे, कैसे उन्हें नंबर मिलते हैं भगवान ही जाने या नंबर देने वाले जानें. इसी बल पर वो कालेज में उच्च क्लासेस में प्रवेश पा जा रहे हैं .
'एकलव्य' का कविलियत के नाते ड्रोन ने अंगूठा मांग लिया था पर आज तो वे बिना मांगे अपना अंगूठा गुरुजनों को समर्पित कर रहे हैं . मुझे याद है मेरे जमाने में छात्रों में प्रतिभागिता रहती थी कि कौन अच्छा कर रहा है, आज तो उस अच्छे के मायने बदल गए हैं.
ओ ऐसे बदले हैं की गुरु जी तो खुद 'कापी मास्टर' हैं हर चीज बिना समझे, बिना चर्चा के परोस दे रहे हैं और शिष्य सहज उसे स्वीकार ले रहा है क्योंकि क्यों करे माथा पच्ची मास्टर ही तो बनना है, नंबर रहेंगे तो सुबिधा से मेरिट बन जायेगी और नौकरी पक्की।
अब एक तपका और है जो वास्तव में कुछ करना चाहता है, विद्यार्थियों में भी और शिक्षकों में भी चूँकि वह जानता है की विना परिश्रम के कुछ हासिल करना आसांन  नहीं है, सो वह गंभीर है पर है कितना मुट्ठी भर. अब उसकी परेशानियाँ भी हैं, स्वाभाविक है चढ़ना जरा मुश्किल होता हैं उतरना और धोखा करना आसान सो इनकी संख्या सहजतया  ज्यादा हो जायेगी, अनुशासित और श्रमशील होना आसान तो है नहीं, अतः दायित्व की कसौटी क्या होगी ? आज यही सवाल है जिसे हर व्यक्ति टाल रहा है.   
विश्वविद्यालयों की गति बाबुओं के हाथ में है जिससे वो जैसा चाह रहे हैं हो रहा है .



शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

क्योंकि इनके आका बैठे हैं


डॉ.लाल रत्नाकर 
उनके मन में क्या पल रहा है 
मुझे क्या पता, पर अपना मन 
तो साफ है इतना तो पता है 
वो रोज़ रोज़ तिकड़मों के फेरे 
डालते रहते हैं .
शायद भोला समझ कर 
क्योंकि कई चीजें वो पाले हैं 
अपने अपराधी मन में 
जिसके जवाब उनकि की भाषा में 
भेष में देना वैसा ही अपराधी होना है 
पर इनकी सजा उन मुल्कों के मुताबिक 
है जहाँ सरे आम ऐसे अपराधियों को 
क़त्ल कर दिया जाता है 
हो सकता है यह व्यवस्था कहने कों 
मानवीय न लगती हो पर दरअसल 
ये बगैर इसके सुधर नहीं सकते 
क्योंकि इनके आका बैठे हैं 
हर उस जगह जहाँ से ये अपराध करते हैं
और वे इनकी रक्षा करते हैं हजारों वर्षों से 
इसीलिए इन्हें फला साहब कहके 
संबोधित  किया जाता है .
असल में ये साहब क्या ?
मानवीयता के पैमाने पर अपराधी अत्याचारी हैं 
जन्मना ये इसके हक़दार बने हुए हैं 
दर असल इन्हें ठीक करना होगा 
बिगड़े हुए गधे की तरह पीट पीट कर 
तब तो इनकी सारी दादागिरी ठीक होगी 
गधे की तरह दरअसल यही भय
उनके मन में पल रहा है  .